Bansawali of Pradip Mehta – Beginning of the Story | प्रदीप मेहता की वंशावली – कहानी की शुरुआत

भारत का एक राज्य झारखंड जो 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग हुआ था। इसी झारखंड राज्य के गढ़वा जिले के पुलिस थाना – भवनाथपुर के (अब पुलिस थाना – केतार) के एक छोटे से गाँव लोहर्गड़ा में मेरा जन्म हुआ। मेरी सही जन्मतिथि ज्ञात नहीं है, लेकिन आधार कार्ड के अनुसार मेरी जन्म तिथि 13 फरवरी 1991 दर्ज है।

वंशावली की शुरुआत

मेरी वंशावली पुराने बुजुर्गों के अनुसार डोमा मेहता से शुरू होती है। ऐसा कहा जाता है कि हमारे पूर्वज दंगवार क्षेत्र के रहने वाले थे।

मेरे पिता के बाबा – राम मनिक मेहता और उनके पूर्वज जमींदार थे। उनके पास सैकड़ों एकड़ जमीन थी। हमारे गाँव लोहर्गड़ा में 1/4 हिस्सेदारी थी। इसके अलावा, पड़ोसी गाँव – मेरौनी, अमरखा और बांखेटा में भी बहुत सारी जमीनें थीं। लेकिन राम मनिक मेहता के तीनों पुत्रों को अधिक ज़िम्मेदारी नहीं मिलने के कारण वे अधिक काबिल नहीं बन पाए। गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें धोखे और लालच में डालकर, साथ ही कुछ पैसे देकर उनकी बहुत सी जमीनें हड़प लीं।

परिवार पर गरीबी की मार

साल 1978 में राम मनिक मेहता और उनकी पत्नी की डूबने से अकाल मृत्यु हो गई। इसके बाद बहुत सी जमीनें किसानों के कब्जे में रह गईं। जब इन जमीनों का पता चला और उनके बीच बंटवारा हुआ, तब तक जमीनों का काफी हिस्सा बेचा जा चुका था। इस कारण मेरे पिता – शिवनाथ मेहता और चाचा – ब्रह्मनाथ मेहता गरीबी में जीने को मजबूर हो गए। मेरे जन्म के समय हमारा परिवार अत्यंत गरीबी से जूझ रहा था।

हमारे पास अच्छे भोजन की भी व्यवस्था नहीं थी। इसके कई कारण थे –

  1. मेरे पिताजी शारीरिक रूप से कमजोर थे।
  2. कमाने का कोई ठोस साधन नहीं था।
  3. हमारे गाँव में बिजली, पानी, सड़क, बाजार जैसी सुविधाएं नहीं थीं

शुरुआती 6-7 वर्षों की यादें मुझे स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन उसके बाद की यादें कुछ हद तक बनी हुई हैं। मैं अच्छे भोजन के लिए तरसता था। मुझे याद है कि एक बार गाँव में किसी पड़ोसी के घर शादी थी और वहाँ दाल-चावल बना था। मैंने बहुत रोकर खाने की ज़िद की, लेकिन दुर्भाग्यवश मुझे नहीं मिल सका। उस दिन करीब 2 घंटे तक रोया था, जिससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि गरीबी कितनी भयानक थी

कुछ सालों बाद, जब पिताजी और चाचा के बीच संपत्ति का बंटवारा हुआ, तो हमारे हालात थोड़े बेहतर हुए। एक साल के भीतर खाने-पीने की स्थिति कुछ सुधर गई। जब मैं 10 साल का हुआ, तब तक हमारा खान-पान गाँव के हिसाब से सामान्य हो गया था। लेकिन फिर भी पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता थागाय का दूध, फल आदि मेरे लिए बहुत दुर्लभ चीज़ें थीं। हमारा मुख्य भोजन मक्के की रोटी, मक्के का भात, चावल और दाल हुआ करता था।

कुपोषण के कारण मैं शारीरिक रूप से कमजोर था और अपने साथ के अन्य बच्चों की तुलना में कमजोर दिखता था। इस बीच मैंने प्राथमिक विद्यालय लोहर्गड़ा से 5वीं कक्षा पूरी की। वहाँ हमारे साथ 7-8 बच्चे पढ़ते थे और मैं पढ़ाई में सबसे अच्छा था।

इसके बाद मिडिल स्कूल (6वीं से 8वीं कक्षा) करने के लिए पड़ोसी गाँव हरिहरपुर के विद्यालय में दाखिला लिया। वहाँ मैं पढ़ाई में एक औसत छात्र था। इसके बाद शंकर प्रताप देव हाई स्कूल, हरिहरपुर से 9वीं और 10वीं कक्षा पास की

9वीं कक्षा के दौरान की घटनाएँ और संघर्ष की कहानी काफी लंबी है, इसलिए उसे मैं अलग लेख में विस्तार से लिखूँगा

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